श्रीकृष्ण का कर्ण से क्या था संबंध ?

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श्रीकृष्ण का कर्ण से क्या था संबंध ?
श्रीकृष्ण का कर्ण से क्या था संबंध ?

राधे-राधे मित्रों, श्रीकृष्ण का कर्ण से क्या था संबंध ?

आज का यह लेख बहुत विशेष है, क्योंकि आज के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि महारथी और महादानी कर्ण और भगवान श्रीकृष्ण के बीच क्या संबंध था और आखिर कृष्ण ने कर्ण को सदैव आदरणीय क्यों बनाया ।

श्रीकृष्ण का कर्ण से क्या था संबंध ?

कर्ण सिर्फ कुंती पुत्र नहीं था, वो सूर्य पुत्र भी था और इस वजह से उसके मुखमंडल पर सूर्य का तेज था । भगवान श्रीकृष्ण शुरू़आत से कर्ण को लेकर गंभीर थे क्योंकि कर्ण किसी भी स्थिति में अर्जुन से कम नहीं था और शक्ति में तो वह पांचो पांडवों पर भारी था, यहाँ तक कि स्वंय नारायण भी उसे हानि नहीं पहुंचा सकते क्योंकि उसके पास सूर्यदेव के कुंडल और कवच थे । श्रीकृष्ण ने अपने बुद्धि बल से कर्ण को भावानात्मक तरीके से अपनी ओर करने का बहुत प्रयास किया परंतु कर्ण तो कर्ण है, एक बार जिसके प्रति निष्ठा रखी, फिर चाहे प्राण चले जाएं, पर निष्ठा पर आंच नहीं आएगी । परंतु कर्ण पर श्रीकृष्ण की विशेष छाया भी थी क्योंकि कर्ण न सिर्फ उनकी कुंती बुआ के ज्येष्ठ पुत्र थे बल्कि परमवीर, पराक्रमी, महारथी और सबसे बड़ी बात, वो धर्म जानते थे और जो धर्म के साथ होता है, कृष्ण उसी के साथ होते हैं । 

पूरा विश्व कर्ण की वीरता और उसके पराक्रम पर चकित था,

स्वंय अर्जुन के पास उसके वाणों के जवाब नहीं थे लेकिन कृष्ण ये जानते थे कि कर्ण का वध सहज नहीं है और उसे अनीति द्धारा ही मारा जा सकता है लेकिन उन्होंने कर्ण को ये वरदान दिया कि उसकी कीर्ति और पराक्रम सदैव अमर रहेंगे और कर्ण की निष्ठा और मित्रता का हर युग में उदाहरण दिया जाएगा । 

कर्ण न सिर्फ एक योद्धा था बल्कि वो मुनि भी था, उसके भीतर क्षत्रिय होते हुए वो सभी गुण थे जो किसी महान तपस्वी मुनि में होते हैं । कर्ण का यश आज भी उसी तरह बना हुआ है, क्योंकि धर्म के मार्ग को अपनाने वाला सज्जन पुरूष यदि किसी वजह से अर्धम की ओर से युद्ध भी करे तो भी उसकी कीर्ति अमर ही रहती है ।

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कर्ण के कवच और कुंडल मांग लिए गए,

उसकी धनुष विद्या को श्राप द्धारा भुलाया गया और उसके पास जो इंद्र की शक्ति थी उसका भी प्रयोग पांडवों के विरुद्ध नहीं हो पाया और अंत में अनीति द्धारा कर्ण वध हुआ । ये सही था या गलत, ये बहस का विषय हो सकता है क्योंकि श्रीकृष्ण जहाँ हैं, धर्म वहीं हैं । लेकिन आप ज़रा सोचिए, वरूण देवता द्धारा दिया गया अर्जन का विशेष रथ, उसपर अर्जुन अपने दिव्य धनुष गांडिव के साथ खड़े हैं और सारथी भगवान श्रीकृष्ण हैं, उसके बावजूद भी जब कर्ण ने बाण चलाए तो रथ दो कदम पीछे हट जाता था, सोचिए कर्ण के बाहुबल और उसके वाणों की शक्ति कितनी होगी । 

ऐसे महाराथी, महादानी कर्ण को हमारा सादर प्रणाम, बोलिए राधे-राधे ।

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