हे अर्जुन – झुके बिना विजय प्राप्त नहीं हो सकती

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झुके बिना विजय प्राप्त नहीं हो सकती
झुके बिना विजय प्राप्त नहीं हो सकती

हे अर्जुन – झुके बिना विजय प्राप्त नहीं हो सकती युद्ध की ठहर चुकी थी, कुरूक्षेत्र धर्मक्षेत्र सज चुका था । सेनाएं एक दूसरे की ओर मुंह बांहे खड़ी थी और भीष्म पीतामाह युद्ध का शंख भूकने ही वाले थे कि ज्येष्ठ पांडू पुत्र युधिष्ठिर ने कहा – सारथी, मेरा रथ कौरव सेना की ओर ले चलो । सारथी ने वैसा ही किया और थोड़ी ही देर में युधिष्ठिर कौरव सेना के समीप पहुंच गए । 

हे अर्जुन – झुके बिना विजय प्राप्त नहीं हो सकती

दुर्योधन के आनंद का ठिकाना नहीं रहा, उसने मामा शकुनि से प्रसन्नता के स्वर में कहा – देखिए मामा श्री, युधिष्ठिर स्वंय चला आ रहा है, लगता है, कौरव सेना की संख्या देखकर उनका पित्ता पानी हो गया है और अब अपने प्राणों की भीख मांगने वो यहाँ चला आ रहा है । उसके बाद दुर्योधन में भीष्म पीतामाह, गुरू द्रोण और कुलगुरू कृपाचार्य से कहा – देखिए, आप सब भी देखिए, हम युद्ध जीत गए । भ्राता श्री हाथ जोड़े यहीं चले आ रहे हैं, हम जीत गए पीतामाह…..हम जीत गए….।

पीतामाह ने बहुत करूणा और निर्मल स्वर में दुर्योधन से कहा –

हे पुत्र, तुम्हारे भीतर यही वो अवगुण है जो तुम्हारे बाकि गुणों को भी छुपा देता है । प्रतीश्रा करना सीखो पुत्र, प्रतीक्षा करना सीखो । क्या तुम्हें युधिष्ठिर की चाल से लग रहा है कि वो प्राणदान मांगने आ रहा है । मुझे तो न उसके चेहरे पर घबराहट दिख रही है और न ही उसके हाथ और पैरों में कंपन । 

तभी गुरू द्रोण ने ओजस्वी स्वर में कहा – हे गांधारी नंदन दुर्योधन, क्या मैनें तुम सबमें से किसी को भी भय का पाठ पढ़ाया है या डरना सीखाया है और अगर नहीं सिखाया तो प्रतीक्षा करना सीखो पुत्र ।

दुर्योधन की प्रशंसा पर प्रश्नचिन्ह लग गया और उसने पीतामाह भीष्म और गुरू द्रोण के सामने फौरन प्रश्न दागे – फिर भ्राता युधिष्ठिर इस ओर क्यों आ रहे हैं । तब भीष्म ने कहा – वो तो उसके यहाँ आने के पश्चात ही पता चलेगा । 

इतनी देर में युधिष्ठिर का रथ वहाँ पहुंच गया और युधिष्ठिर हाथ जोड़कर सबसे पहले पीतामाह के रथ के पास पहुंचे । पितामाह ने युधिष्ठिर को देखा और वो भी अपने रथ से उतरे और पास जाकर पूछा ।

क्या हुआ पुत्र ? कोई दुविधा है ?

युधिष्ठिर ने जवाब दिया – हे पीतामाह, आज हम इस धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र में एक युद्ध लड़ने जा रहे हैं जिसका क्या परिणाम होगा, ये कोई नहीं जानता लेकिन बचपन से लेकर आज तक हम सभी भाइयों ने कोई भी काम आपकी आज्ञा लिए बगैर शुरू नहीं किया इसलिए मैं आपसे युद्ध की आज्ञा लेने आया हूं और ये कहकर युधिष्ठिर हाथ जोड़कर पीतामाह के चरणों में प्रणाम करने लगे । पितामाह ने युधिष्ठिर को उठाया और कहा – हे पुत्र, अगर तुम आज आज्ञा लेने नहीं आते, तो मैं तुम्हें श्राप दे देता । इसपर युधिष्ठिर ने कहा – हे कुरूश्रेष्ठ आपके आशिर्वाद के बिना तो हम आखेट पर भी नहीं जा सकते तो ये तो फिर भी युद्ध है इसलिए आशिर्वाद दें । 

पीतामाह गदगद हो गए और कह दिया – विजयी भव पुत्र….विजयी भव ।

इसके बाद एक-एक करके युधिष्ठिर गुरू द्रोण, कृपाचार्य और मामा शल्य के पास गए और जाकर युद्ध की आज्ञा और आशिर्वाद मांगा और सभी ने उन्हें अपने-अपने तरीकों से विजय का आशिर्वाद दिया । दुर्योधन ईष्या से क्रोधित हो गया और कहा – हमारी सेना के महापुरूषों का तो कोई जवाब ही नहीं, शत्रु को ही विजयश्री का आशिर्वाद दे डाला…वाह ।

अपने रथ पर बैठे अर्जुन और भगवान कृष्ण ये सब देख रहे थे और फिर अर्जुन ने कृष्ण से पूछा –

हे गिरधर, आज मैं भी भ्राता दुर्योधन से कहीं न कहीं थोड़ा सहमत हूं । मुझे ये बताइए कि अगर पीतामाह और बाकि पूजनीय लोगों ने आशिर्वाद दिया ही क्यों, क्या ऐसी स्थिति में जब दोनों सेनाएं एक-दूसरे के रक्त में स्नान करने को तैयार हैं और अब दूजा कोई विकल्प नहीं है,

ऐसे में आशिर्वाद की कवच देना दुर्योधन के साथ अन्याय नहीं है ?

इसपर कृष्ण मुस्कुराते हुए उत्तर देते हैं – हे पार्थ, झुकने का परिणाम आशिर्वाद ही होता है, अगर कोई तुम्हारा परम शत्रु है और तुम्हारा वध करना ही उसका लक्ष्य है, उसके बावजूद भी अगर तुम उसके सामने झुकोगे, उसका चरण स्पर्श लोगे, तो सामने वाला व्यक्ति आशिर्वाद देने को मजबूर हो जाएगा क्योंकि यही आशिर्वाद का गुण है और दुर्योधन को भी ये आशिर्वाद ज़रूर मिलता अगर वो भ्राता युधिष्ठिर के चरण स्पर्श करता लेकिन उसका अहंकार आड़े आ गया । अगर वो भ्राता युधिष्ठिर के चरण स्पर्श करता तो उसे भी विजयश्री का आशिर्वाद अवश्य मिलता । इसलिए हे अर्जुन – झुकना विजयी पुरूष की निशानी है, अगर आप झुकना जानते हैं तो कभी युद्ध की नौबत ही नहीं आएगी, अगर आप झुकना जानते हैं तो आप जीवन की हर परीक्षा में हमेशा विजयी रहेंगे ।

बोलिए – जय श्रीकृष्ण

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