हे माधव, मैं जीवन त्याग सकता हूं पर दुर्योधन को नहीं !

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मैं जीवन त्याग सकता हूं पर दुर्योधन को नहीं
मैं जीवन त्याग सकता हूं पर दुर्योधन को नहीं

मैं जीवन त्याग सकता हूं पर दुर्योधन को नहीं :- श्रीकृष्ण ने बड़े ही विनम्र स्वर में कहा – हे ज्येष्ठ कौन्तेय, हे दानवीर कर्ण, तुम तो सब जानते हो, जानते हो कि धर्म कहाँ हैं और अधर्म कहाँ है ।

फिर भी दुर्योधन का साथ दे रहे हो, क्यों ?

कर्ण की आंखों में आंसू उतर आए और बोला – हे गिरधर, हे त्रिलोकी नाथ, आप जिस ओर हैं, उस ओर ही विजय निश्चित है, ये मैं जानता हूं, और ये भी जानता हूं कि महाभारत के युद्ध में मेरी हार और मेरे प्राण दोनों पराजित होंगे, परंतु उसके बावजूद भी मैं मित्र दुर्योधन को नहीं छोड़ सकता । हे माधव, दुर्योधन मेरा कृष्ण तो नहीं, पर मैं उसका सुदामा अवश्य हूं । 

मैं जीवन त्याग सकता हूं पर दुर्योधन को नहीं जब सबने मेरे लिए अपने द्धार बंद कर दिए थे और मुझे धुतकारा था,

तब अकेला दुर्योधन आगे आया, मुझे मित्र कहकर गले लगाया और अंग देश का राजा बनाया । हे गोविंद, न मुझे अंग देश चाहिए और न ही पृथ्वी, मुझे दुर्योधन का कर्ज उतारना है क्योंकि मैं उसका कर्जदार हूं । मेरा जीवन और मरण सब दुर्योधन का है, जब तक मेरे प्राण रहेंगे, दुर्योधन की विजय और पराजय के बीच मैं आपको सदा खड़े मिलूंगा । ये मेरा अहंकार नहीं बोल रहा, ये मेरी दुर्योधन के प्रति निष्ठा बोल रही है । आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, आप तो सब जानते हो, इसलिए मुझे पांडवों के खेमे में बुलाने का प्रयास न करें, ये संभव नहीं ।

कृष्ण सब सुन रहे थे और मुस्कुराकर कर्ण से बोले –

हे कर्ण, तुम न सिर्फ कौन्तेय हो, न सिर्फ सूर्यपुत्र हो बल्कि तुम एक महापुरुष हो और जबतक ये पृथ्वी रहेगी, मानव जाति तुम्हारा नाम सदैव आदर सहित लेगी । लेकिन मुझे ये बताओ कि तुम एक पुत्र भी हो, बुआ कुंती ने तुम्हारे साथ चाहे कोई भी अन्याय किया हो, लेकिन तुम रहोगे तो उनके पुत्र ही, तो बताओ, कि भला अपने भाइयों की हत्या तुम कैसे कर सकते हो ।

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कर्ण सब समझ रहे थे और बोले –

मेरा वचन हे माधव तुम्हें, मैं अर्जुन के अलावा किसी पांडव का वध नहीं करूंगा लेकिन इस धरती को मुझमें और अर्जुन में से किसी एक को ही चुनना होगा । माता कुंती के 5 पुत्र हर हाल में जीवित रहेंगे । फिर कर्ण बोले – हे नाथ, बातों ही बातों में आपने 4 पांडवों को बचा लिया, लेकिन आप चिंता मत करिए, मैं भले ही दुर्योधन के साथ हूं लेकिन मैं अपने प्रण का पक्का हूं, या तो मेरे हाथ अर्जुन वध होगा या अर्जुन के हाथों मेरा वध हो जाएगा । मैं ये आपको वचन देता हूं और फिर दोनों हाथ जोड़क कर्ण ने श्रीकृष्ण से जाने की आज्ञा मांगी । 

कृष्ण ने कहा –

तुम्हारी सदा जय हो कर्ण, तुम मित्रता और वीरता और दानवीर होने से सारे जग में सदा प्रेरणास्त्रोत और आदरणीय रहोगे ।

बोलिए राधे – राधे ।

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